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Monday, April 16, 2018

४१ ...ख्यातिप्राप्त प्रतिष्ठित साहित्यकार आदरणीया देवी 'नागरानी' जी से विशेष परिचय

शाम का वक़्त, लखनऊ शहर का हज़रतगंज चौराहा। सड़क के एक तरफ कैफे-काफी डे तो दूसरी तरफ राजभवन और सड़क के एक कोने में झटपटलाल का चटपट चाट भंडार जिसके पानी के बताशे न ही लखनऊ बल्कि दूर-दराज़  के इलाकों में मशहूर हैं। मैं एक कोने में खड़ा सड़क पार करने की प्रतीक्षा में था तभी मेरी नज़रें चाट के ठेले पर आकर ठहर गईं। विश्वास नहीं हो रहा था कक्का जी ! एक हाथ में कुछ श्लोगन लिखीं तख़्तियाँ और दूजे में पत्तल के दोने। मैंने कक्का जी को अनदेखा करते हुए मुँह घुमा कर सड़क पार करने लगा तभी कक्का जी ने आवाज लगाई। अरे कलुआ ! काहे देखकर अनदेखा कर रहा है। मैं क्षणभर के लिए लज्जित  हो गया ! परन्तु कक्का जी के बुलाने पर ठेले के पास जा पहुँचा। क्यूँ रे ! कलुआ हमें देखकर नज़रें चुराता है। नहीं-नहीं कक्का जी ऐसी बात नहीं है वो तो मैं...... ! नहीं -नहीं क्या ? बात काटते हुए अच्छा ये सब छोड़िए आप बताइये आप यहाँ क्या कर रहे हैं ! अरे तुझे पता नहीं विपक्षी पार्टी ने मंत्री जी पर गंभीर आरोप लगायें हैं उसी के विरोध में प्रदेश साहित्यकार मंच ने मुझे इस विरोध हेतु लीडर चुना है और सारी तख़्तियों पर मेरे ही लिखे श्लोगन अंकित किए गए हैं सो मैं भी चला आया मैदान में मंत्री जी के सपोर्ट में। चल तूँ भी एक तख़्ती थाम ले ! अगले वर्ष चुनाव होने वाले हैं बाक़ी तू स्वयं समझदार है। मैं झल्लाते हुए  वहाँ से चलता बना। आपको ही मुबारक़ हो नेता जी का चुनाव मैं जा रहा हूँ ब्लॉग पर सिर मारने समझे !

ख्यातिप्राप्त प्रतिष्ठित साहित्यकार 
आदरणीया देवी 'नागरानी' जी 
'लोकतंत्र' संवाद मंच इस ख्यातिप्राप्त प्रतिष्ठित 
साहित्यकार का अपने साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में हार्दिक स्वागत करता है।   

परिचय : आदरणीया देवी 'नागरानी'

जन्मः ११ मई, १९४१, कराची (तब भारत)   
                                                                                                                             
माता-पिता का नाम- किशिनचंद ललवाणी व् हरी बाई लालवाणी

शिक्षाः बी.ए. अलीं चाइल्ड, व गणित में विशेष डिग्री, न्यूजर्सी से।
                                     
मातृभाषाः सिंधी,भाषाज्ञान: हिन्दी, सिन्धी, गुरमुखी, उर्दू, तेलुगू, मराठी, अँग्रेजी,सम्प्रतिः शिक्षिका, न्यू जर्सी. यू.एस.ए (सेवानिवृत)

प्रकाशित सिन्धी संग्रह:
ग़म में भीगी ख़ुशी (ग़ज़ल-2007), उड़ जा पंछी (भजनावली-2007), आस की शम्अ (ग़ज़ल-2008), सिंध जी आऊँ जाई आह्याँ (कराची-2009), ग़ज़ल-(ग़ज़ल -2012), माँ कहिं जो बि नाहियाँ (कहानी-2016), गुलशन कौर (कहानी-2018), किताबी समालोचनाएं (--प्रेस )

हिन्दी संग्रह:
चराग़े-दिल (ग़ज़ल-2007), दिल से दिल तक (ग़ज़ल-2008), लौ दर्दे-दिल की (ग़ज़ल-2008)
भजन-महिमा (भजनावली-2012), ऐसा भी होता है (कहानी -2016), सहन-ए-दिल (ग़ज़ल-2017)
गंगा निरंतर बहती रही (लघुकथा-2017),कविता की पगडंडियां (काव्य-2017), माँ ने कहा था (काव्य-2017), The Journey (अंग्रेजी काव्य-2009)

हिन्दी से सिन्धी अनुवाद:
बारिश की दुआ (कहानी संग्रह-2012), अपनी धरती (कहानी संग्रह-2013), रूहानी राह जा पांधीअड़ा (काव्य-2014), बर्फ़ जी गरमाइश (लघुकथा-2014), आमने- सामने (हिन्दी-सिंधी काव्य अनुवाद-2016), आँख ये धन्य है (नरेंद्र मोदी काव्य- 2017), चौथी कूट (वरियम कारा का कहानी संग्रह-प्रकाशन-साहित्य अकादमी),

सिन्धी से हिन्दी अनुवाद: , सिन्धी कहानियाँ (कहानी-2014), सरहदों की कहानियाँ (कहानी-2015), अपने ही घर में (कहानी-2016), दर्द की एक गाथा (कहानी 2016), एक थका हुआ सच (अतिया दाऊद काव्य -2016), विभाजन की त्रासदी (कहानियाँ विभाजन की-2017), काव्य की पगाडंडियां (काव्य-2017), अहसास के दरीचे (प्रांतीय-विदेशी कहानियाँ-प्रेस), रूमीमसनवी (अंग्रेजी से हिंदी-प्रेस)

अन्य अनुवाद:
सफ़र- (अङ्ग्रेज़ी काव्य का हिन्दी सिंधी अनुवाद--ध्रु तनवाणी-2016)
सिन्धी कथा (सिन्धी कहानी का मराठी अनुवाद- डॉ. विध्या केशव चिट्को-2016), कई कहानियाँ मराठी, तेलुगु, तमिल, मलयालम, पंजाबी, उर्दू व् अंग्रेजी में अनुवाद हुई हैं.

सम्मान - पुरस्कार 
                                                                                                  
अंतराष्ट्रीय हिंदी समिति, शिक्षायतन व विध्याधाम संस्था NY -काव्य रत्न सम्मान, काव्य मणि- सम्मान- “ProclamationHonor Award-Mayor of NJ, सृजन-श्री सम्मान, रायपुर -2008, काव्योत्सव सम्मान, मुंबई -2008,  “सर्व भारतीय भाषा सम्मेलनमें सम्मान, मुंबई -2008, राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषदपुरुस्कार-2009, “ख़ुशदिलान-ए-जोधपुर सम्मान-2010, हिंदी साहित्य सेवी सम्मान-भारतीय-नार्वेजीयन सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम, ओस्लो-2011मध्य प्रदेश तुलसी साहित्य अकादेमी सम्मान-2011, जीवन ज्योति पुरुसकार, गणतन्त्र दिवस-मुंबई-2012, साहित्य सेतु सम्मान -तमिलनाडू हिन्दी अकादमी-2013, सैयद अमीर अली मीर पुरुस्कार- मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति-2013, डॉ. अमृता प्रीतम लिट्ररी नेशनल अवार्ड, नागपुर-2014, साहित्य शिरोमणि सम्मान-कर्नाटक विश्वविध्यालय, धारवाड़-2014, विश्व हिन्दी सेवा सम्मान-अखिल भारतीय मंचीय कवि पीठ,यू.पी-2014, भाषांतर शिल्पी सारस्वत सम्मान- भारतीय वाङमय पीठ-कोलकता-जनवरी 2015,

हिन्दी सेवी सम्मानअस्माबी कॉलेज, त्रिशूर-केरल- सितंबर 2015,  हिंदी गौरव सम्मान-साठे कॉलेज, मुंबई-मार्च 2017, ‘प्रवासी साहित्यकार सम्मान विश्वभाषा साहित्य और रामकथा-अन्तराष्ट्रीय संगोष्ठी प. दीनदयाल महाविश्वविध्यालय, सागर (म.प-2017)

सिन्धी अनुदित कथाओं को अब सिन्धी कथा सागर के इस लिंक पर सुनिए.


आदरणीया देवी 'नागरानी' जी की एक रचना 

पहचानता है यारो, हमको जहान सारा
हिंदोस्ताँ के हम है, हिंदोस्ताँ हमारा

यह जँग है हमारी, लड़ना इसे हमें है
यादें शहादतों की देंगी हमें सहारा

 इस मुल्क के जवाँ सब, अपने ही भाई बेटे
करते हैं जान कुर्बाँ, जब देश ने पुकारा

 मिट्टी के इस वतन की, देकर लहू की ख़ुशबू
ममता का क़र्ज़ सारा, वीरों ने है उतारा

 जो भेंट चढ़ गए हैं, ज़ुल्मों की चौखटों पर
कुर्बानियों से उनकी, ऊंचा है सर हमारा

 लड़ते हुए मरे जो, उनको सलाम 'देवी'
निकला जुलूस उनका, वो याद है नज़ारा


चलिए ! चलते हैं इस सप्ताह के श्रेष्ठ रचनाओं की ओर 


 उसे तो जाना था , वो जा चुकी, है शिकवा क्या
वो कितना खींच भी सकती थी मेरी व्हील चेयर 

  तकनीकी युग में सोशल  मीडिया  
अभिव्यक्ति का एक बेहतरीन  माध्यम बन कर उभरा है |

 तुमसे उजियारा है
गीत मधुर होगा
जब मुखड़ा प्यारा है।


जिन लोगों ने इसकी सृष्टि की 
शिव जी की भांति वही आज 
उससे बचने के लिए 
इधर -उधर भाग रहे हैं 

 हर मृत्यु के बाद
रोज़मर्रा की साँसे
ले ही लेता है इंसान ! 

 तेरी धरा पर, ओ मां भवानी,
हर नेत्र में है, क्यों  आज पानी,
तुझसे मांगे थे फूल जो,


 कौन यहाँ किसको ढूंढे है 
किसे यहाँ किधर जाना है,
खबर नहीं कण भर भी इसकी 
पल भर का नहीं ठिकाना है !

स्त्री हूँ मैं पर अबला नहीं 

 जब  ही धरा पे
आई तनया..
पराई है,पराई !
पराये घर जाएगी,


 गुज़र रही है उमर कबीरा
हुआ नहीं कुछ मगर कबीरा
बड़ा वक़्त का सच है लेकिन
छोटी तेरी बहर कबीरा

 दुष्यंत कुमार से क्षमा याचना के साथ – 
घर का भेदी कुर्सी पाए -
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना, मेरा मक्सद नहीं, 
मेरी कोशिश है, तेरी, कुर्सी भी मिलनी चाहिए.

हुआ कुछ ऐसा कि शहरी जंगल में बसा  
मेरा दो कमरे का घर 



 कल रात बहुत बारिश हुई,

धुल गया ज़र्रा-ज़र्रा,

चमक उठा पत्ता-पत्ता,

बह गई राह की धूल,


 बच्ची थी ना वो तो
खिलौनों से ही खेलती होगी
गुड़िया लेकर सोती होगी


 जिन्दगी 
शुरु होती है 
और 
गिनतियाँ 
शुरु हो जाती है 

 नंगी प्रजातियों की नंगी ज़बान
थूककर चाट रहे अपने बयान

चेहरों पर कराकर फेशियल 
खोल ली है बारूद की दुकान


 ये बारिशें तुम्हारे मेरे साथ की,

गवाह बन गयी है,

बूंदों ने संग-संग हमे जो छू लिया है..

कुछ और वो भी जवां हो गयी है..


 चाहता है बारम्बार। ज्ञात है 
सभी को अंधकारमय 
नेपथ्य का रहस्य,
फिर भी


 नहीं कटता अकेले 
जिंदगी का सफर 
किसे सुनाएँ 

 कैसा डर ?
किससे डर ?
किस बात का डर ?
डरने की वजह ?


 कुलीन,गांडीवधारी, तू
सखा-गिरधारी,
द्रोण शिष्य,तुणीर भव्य!
लांछित,शापित, शोषित
सहता समाज का दंश
अकेला, मैं एकलव्य!


 ''ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए''।

साकार हुवा सपना
उसे देख कर
पूर्ण तृप्ता हूं मैं ।
मैं गर्वित हूं

 मन अकुला जाता है जब तुम नहीं आते
एक टीस सी उठती है हृदय में 
जैसे आ गया हूँ मैं प्रलय में 

जब कोई तितली, हौले से आकर,
तुम्हारे लगाए फूलों को अपने
मखमली पंखों से सहलाकर,
कहे - 'प्यार'.....
तो उसे तुरंत उड़ा देना !!!

 अरे यार!  परे हट! मालकिन ने देख 
लिया तो मेरी खैर नहीं.....यूँ गली के कुत्तों से मेरा बात 
करना मालकिन को बिल्कुल नहीं भाता....मेरी बैण्ड बजवायेगा क्या?....

 एक नृशंस कालखंड दर्ज हो रहा है इतिहास में
            भीड़ की तानाशाही और रक्तिम व्यवहार
ताकत का अमानवीय प्रदर्शन
क़ानून की धज्जियाँ उड़ाता शाशन-प्रशासन....

अविद्या क्या है?
दुःख को ना जानना, दुःख के 
उदय को ना जानना, दुःख-निरोध को ना 
समझना और दुःख त्यागने का मार्ग ना जानना अविद्या कहलाता है.


समाचार आया है -
हवाई जहाज़ में 
मच्छर ने यात्री को काटा !
सनसनी-ख़ेज़ समाचार/ ब्रेकिंग न्यूज़  
तब भी बनता 

आप हमारे बीच नहीं है ये सच है
 पर ऐसा प्रतीत होता है कि ये किरदार 
आज भी सजीव है। चाचाजी आपकी लेखनी और सहृदयता को शत-शत नमन।

 दूसरों के घाव सिलने से नहीं फुर्सत जिन्हें
अपने उधड़े ज़ख्म का उनको कहाँ आभास है 

 वो कहते हैं -   
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।   
मेरे भी सपने थे   
बेटी को पढ़ाने के   
किसी राजकुमार से ब्याहने के   

 यह जो रंगमंच पर हो रहा है
लिखी गयी है इसकी स्क्रिप्ट कहीं और
किसी और उद्देश्य से

 उड गई जो टीन की दीवारें 
         सो लेगें कुछ रोज 
         खुले  आसमाँ के तले 
          जोड लेगें फिर से 
         लगाएगे पैबंद नए.....

 महक उठा मेरा मन
फिर हुआ शुरू
सिलसिला बातों रस्मों का....
ऐसी लगन लगी
आपकी बातों के मोहपाश में

अलगाव की अग्नि: राजन मंगरियो (अनुवाद: देवी नागरानी)


  टीपें
 अब 'लोकतंत्र'  संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार'
सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित
होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

आज्ञा दें  !


'एकलव्य' 


 उद्घोषणा 
 'लोकतंत्र 'संवाद मंच पर प्रस्तुत 
विचार हमारे स्वयं के हैं अतः कोई भी 
व्यक्ति यदि  हमारे विचारों से निजी तौर पर 
स्वयं को आहत महसूस करता है तो हमें अवगत कराए। 
हम उक्त सामग्री को अविलम्ब हटाने का प्रयास करेंगे। परन्तु 
यदि दिए गए ब्लॉगों के लिंक पर उपस्थित सामग्री से कोई आपत्ति होती
 है तो उसके लिए 'लोकतंत्र 'संवाद मंच ज़िम्मेदार नहीं होगा।  
धन्यवाद।
सभी छायाचित्र : साभार गूगल

Monday, April 9, 2018

४० ............जब-जब राजनीति डगमगायेगी

रात का वो सन्नाटा रह-रहकर भयंकर वातावरण पैदा कर रहा था और उसपर बार-बार झींगुर की टर्राने की आवाज ख़ामोशी में चार-चाँद लगा रही थी। दोलन घड़ी की वो बार-बार टिकटिक-टुकटुक  की आवाज न जाने क्यों आज मेरे मन में अशांति उत्पन्न कर कर रही थी। थोड़ी ही देर पहले भोजन से उठकर मैं अपने कमरे में एक भूतिया उपन्यास पर विचार कर रहा था। तभी एकाएक दरवाजे पर किसी जाने-पहचाने शख़्स की चिंघाड़ने की आवाज सुनाई पड़ी। मैं बहुत डर गया था संभवतः उपन्यास का चलचित्र मेरे दिमाग में जीवित हो उठा था ! हिम्मत करके मैंने दरवाजा खोला। मिठाईलाल चाट वाला ! मैं ऊपर से नीचे की ओर उसे घूरने लगा। वह बहुत ही घबराया हुआ लग रहा था। मैंने उससे पूछा, अरे ! मिठाई लाल इतनी रात को कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा तुम पर। सब ठीक तो है ! 
मिठाईलाल - कुछ ठीक नहीं है कलुआ ! 
कलुआ - क्यूँ क्या हुआ ?
मिठाईलाल - कक्का जी हस्पताल में पसरे हैं। काफी चोट लगी है उनको !
कलुआ ( आँखें फाड़कर आश्चर्य से ) - अरे ! ये सब कैसे हुआ ?  और कहाँ ?
अरे क्या बताऊँ कलुआ भईया ! कल कक्का जी के पुस्तक का विमोचन है आज शाम को मैं और कक्का जी मंत्री जी के पास निमंत्रणपत्र व पुस्तक की एक प्रति लेकर उनको विमोचन हेतु आमंत्रित करने चले गए। गेट पर ही उनके मुस्टंडे लठैतों ने रोक लिया। हमने उन्हें आने का उद्देश्य भी बताया फिर भी उन्होंने हमारी एक न सुनी। कक्का जी भी ताव -पैबंद ! मंत्री जी से मिलने का हठ करते हुए वहीं गेट पर ही धरने पर बैठ गए और कहने लगे मैं मंत्री जी से मिले बिना नहीं जाऊँगा। मंत्री जी के लठैतों ने कक्का जी को बार-बार समझाया पर वे नहीं माने। अंत में लठैतों ने मंत्री जी के पीए को फोन किया। कुछ देर बात करने के बाद अचानक आवास के अंदर से कुछ और लठैत हवा में लाठी लहराते हुए गेट पर आ गए और लठैतों के सरदार का इशारा पाते ही हम पर टूट पड़े। फिर क्या था ,कक्का जी की वो तुड़ाई हुई ,वो तुड़ाई हुई पूछो मत ! एक लठैत कक्का जी की धोती खींचने लगा और एक ने कक्का जी की बाईं और दूसरे ने दाईं टाँग पकड़ रखी थी और बचे -खुचे कक्का जी की निर्मम धुलाई करते नज़र आ रहे थे। किताब की प्रति सड़क पर पड़ी थी संभवतः जिसका विमोचन कक्का जी की धुनाई के साथ प्रारम्भ हो चुका था। उनकी ज़ुबान सड़क को स्पर्श करती नजर आ रही थी। ओह ईश्वर ! क्या बताऊँ कलुआ ! कक्का जी की कविताओं का वीररस अब तक सुना था पर करुणरस इतना भयानक होगा विश्वास न था। ख़ैर किसी तरह आस-पास के लोगों ने कक्का जी की जान बचाई और उन्हें हस्पताल पहुँचाया। अभी भी कक्का जी बेहोशी की हालत में अपने पुस्तक का विमोचन मंत्री जी से करवाने के सपने देख रहे हैं। 
कलुआ तुम ही उनको समझाओ नहीं तो गज़ब हो जाएगा ! 
कलुआ ( टालमटोल करते हुए ) - अरे मिठाईलाल ! सोमवार को मेरी प्रस्तुति है लगभग दो-चार घंटे तो लग ही जायेंगे। कल ''रवींद्र'' जी आ रहे हैं हमारे पाठकों के बीच सो मैं अभी नहीं आ सकता। तुम चलो ! मैं अपना काम निपटाकर आता हूँ और कक्का जी को समझाता हूँ। किसी महान लेखक ने कहा था 
जब-जब राजनीति डगमगायेगी 
साहित्य उसे संभाल लेगा ! 
परन्तु आज यह गंभीर विषय बनता जा रहा है। कौन किसको संभालता नजर आ रहा है मुझे सभवतः बताने की आवश्यकता नहीं।  
 ख़ैर चलिए ! आप सभी पाठकों को आज ऐसे व्यक्तित्व से मिलवाता हूँ जिसके नाम व लेखन के जज़्बे से शायद ही हिंदी ब्लॉग जगत का कोई भी पाठक अथवा रचनाकार अपरिचित हो। जिसके कलम की एक-एक स्याही निस्वार्थ भाव से क्रांतिकारी शब्दों की रचना में निरंतर प्रयत्नरत है। समसामयिक मुद्दे इनकी लेखनी का मूल स्रोत और लेखन भी एक चमत्कृत शैली में प्रगतिवादी विचारों का शंखनाद करती हुई समाज को सत्य के मार्ग पर निरंतर चलने को प्रेरित करती है।        
आदरणीय 'रवींद्र' सिंह यादव जी 
'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला की इस कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत व अभिनन्दन करता है। 

परिचय : आदरणीय 'रवींद्र' सिंह यादव जी 

पिता - स्वर्गीय श्री नाथूराम यादव

माता - स्वर्गीया श्रीमती फूलवती यादव

जन्म - 14 जनवरी 1968 ,  महाराजपुरा ( डिलौली ), चकरनगर, इटावा (उत्तर प्रदेश) 206125  में साधारण किसान परिवार में जन्म। 

कार्यक्षेत्र - चिकित्सा,  कृषि, स्वतंत्र लेखन, ब्लॉगिंग, समाज सेवा

लेखन विधाएं - कविता , कहानी , लेख , संस्मरण, रिपोर्ताज़ , हाइकु, वार्ता, रेडियो स्क्रिप्ट लेखन आदि

प्रकाशित कृतियाँ - 1. प्रिज़्म से निकले रंग (काव्य संग्रह -2018 )


 ISBN: 978-93-86352-79-8

                                                                                




   2. पंखुड़ियाँ 24 लेखक 24 कहानियाँ (सामूहिक कहानी संग्रह- 2018 )

   3. प्यारी बेटियाँ (साहित्यपीडिया सामूहिक काव्य संग्रह-2018 )

सम्पादन- दीपदर्शन-92  (स्मारिका )

सम्मान - साहित्यपीडिया काव्य सम्मान

प्रसारण -   आकाशवाणी ग्वालियर मध्य प्रदेश  से 1992 से 2003 के बीच कविता, कहानी, वार्ता एवं विशेष कार्यक्रमों का नियमित प्रसारण

ब्लॉग - 1. हिन्दी-आभा*भारत 

               http://www.hindi-abhabharat.com.

           2. हमारा आकाश:शेष-विशेष

               https://hamaraakash.blogspot.in


          3. Prismatic Reflection@Ravindra Singh Yadav                                                                                          https://ravindrasinghyadav.wordpress.com

         4. YouTube Channel-  मेरे शब्द--स्वर
अन्य - कई वेबसाइट ( शब्दनगरी , प्रतिलिपि.कॉम , iBlogger.in, साहित्यपीडिया, दैनिक अमर उजाला काव्य,  दैनिक नवभारत टाइम्स आदि ) एवं सामूहिक ब्लॉग ( पाँच लिंकों का आनन्द, कविता मंच आदि ) पर सक्रियता। 

विशेष - अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फ़िल्म निर्देशक स्वर्गीय कुंदन शाह जी के साथ नवम्बर 2006 में फ़िल्म "थ्री सिस्टर्स" की स्क्रीनिंग के दौरान एक कार्यक्रम में मंच साझा करने का अवसर।  

सम्प्रति - सफ़दरजंग एन्क्लेव, नई दिल्ली में निजी चिकित्सा संस्थान में कार्यरत। 

सम्पर्क सूत्र - rsyadav.dilauli@gmail.com

मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों, क़स्बों में रहकर अध्ययन।  अध्ययन के दौरान 1988 से लिखना आरम्भ किया।  ग्वालियर से प्रकाशित दैनिक भास्कर, दैनिक नवभारत, दैनिक आज, दैनिक आचरण, दैनिक स्वदेश आदि समाचार-पत्रों में कविताओं और लेखों का प्रकाशन लेखन के प्रति रूचि और छपास सुख की अनुभूति को बढ़ाता गया। सन  1992 में लम्बे संघर्ष के उपरांत आकाशवाणी ग्वालियर से कविता ,कहानी ,वार्ता ,विशेष कार्यक्रम आदि के प्रसारण का अवसर मिला जो सन 2003 तक ज़ारी रहा। ग्वालियर की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आयोजित कवि गोष्ठियों,विचार गोष्ठियों में नियमित काव्यपाठ एवं विचार-विनिमय। 

2007 से नई दिल्ली में जीविका के लिए एक निजी चिकित्सा संस्थान में कार्यरत। पारिवारिक परिस्थितियों के चलते 2003- 2012 तक लेखन से पूर्णतः विराम लिया। स्वाध्याय ज़ारी रहा। 


            2012 से ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल पर सक्रिय हुआ। अक्टूबर 2016 में ब्लॉग जगत् में प्रवेश किया। ब्लॉग जगत् में सक्रियता मेरे लिए नया अनुभव था जहाँ प्रबुद्ध जनों से आत्मीय जुड़ाव स्थापित हुआ। फ़िलहाल एक पुस्तक की प्रकाशन सम्बन्धी प्रकिया में व्यस्त हूँ। आपके सहयोग ,समर्थन और आशीर्वाद से ब्लॉगिंग का सुहाना सफ़र रास्तों की तलाश करता हुआ अपनी मंज़िल की ओर अग्रसर है। 

आदरणीय  रवींद्र सिंह यादव  जी की एक रचना 

 बादल आवारा 

आवारा     बादल    हूँ     मैं
अपने  झुंड  से  बिछड़  गया  हूँ   मैं
भटकन   निरुद्देश्य   न  हो
इस  उलझन  में  सिमट  गया  हूँ   मैं।


सूरज  की  तपिश  से  बना   हूँ   मैं
धनात्मक  हूँ   या   ऋणात्मक   हूँ    मैं
इस ज्ञान  से  अनभिज्ञ  हूँ    मैं
बादलों   के  ध्रुवीकरण
और  टकराव  की  नियति   से   छिटक    गया  हूँ   मैं
बिजली   और   गड़गड़ाहट  से    बिदक    गया   हूँ   मैं।


सीमेंट-सरिया   के   जंगल   से   दूर
उस  बस्ती  में   बरसना   चाहता  हूँ    मैं
जहाँ.................................................

जल  की  आस   में
दीनू   का  खेत  सूखा  है  
रोटी   के   इंतज़ार   में  
नन्हीं   मुनिया    का  पेट   भूखा   है  
लहलहाती   फ़सलों   को
निहारने   सुखिया  की आँखें   पथराई   हैं
सीमा   पर  डटे  पिया   की  बाट   जोहती
सजनी की निग़ाहें  उदास  दर्पण से टकराई हैं
गलियों   में  बहते  मटमैले  पानी  में
बचपन   छप-छप   करने   को  आकुल  है  
अल्हड़    गोरी   हमउम्र सखियों  संग
झूले  पर  गीत  गाने  को   व्याकुल   है।    


माटी   की  भीनीं-सौंधी  गंध
हवा     में    बिखर    जायेगी  
हरियाली    की   चादर   ओढ़  
पुलकित   बसुधा   लजायेगी 
नफ़रत  बहेगी नदी-नालों में
सद्भाव   उगेंगे   ख़्यालों   में


उगे  हैं  बंध्या  धरती   पर  शूल   जहाँ
पुष्पित  होंगे   रंग-बिरंगे  फूल   वहाँ
सूखे    कंठ   जब   तर-ब-तर   होंगे
अनंत   आशीष    मेरे    सर    होंगे।


यह  दृश्य   देख  
बादल  होने  पर   इतराऊँगा  
काल-चक्र    ने  चाहा   तो
फिर  बरसने  आऊँगा........!!!
चलिए  ! चलते हैं आज की रचनाओं की ओर 

एक फ़िज़ूल ग़ज़ल
 ज़ख़्म बदन पर अगर लगे तो भर ही जाएगा

लेकिन दिल का घाव हमेशा ताजा लगता है।

 तुम्हारे नाम का पहला अक्षर! 
 मैं अपनी हथेली को
नहीं दिखती थी मुझे रेखाएं

न हथेली का रंग

 मिट जाएँगी  दूरियाँ, होगा दुख का नाश।
आलिंगन में बाँधकर,कस लेना भुजपाश।

 डट कर चुनौतियों का किया सामना मगर
दो आंसुओं के वार से पल भर में हिल गए

 हेल्थ ब्लंडर 
 जाति,धर्म,प्रदेश,बंधन पर न गौरव कीजिये

मानवी अभिमान लेकर, धीमे धीमे दौड़िये !

 शैतान की कोई आत्मा नहीं होती 
 कि अब क्या उड़ना ?
ज़िन्दगी बीत गई कांपते हुए !

कुछ दिन पहले तक लगता रहा

 नीली झील....
नीला अम्बर ,नीली झील 

 परदेस में गरमी 
 अभी बहुत है देर
हवा की ठिठुराती सिहरन

जाने में

 उड़ान भरें 
 चलो बाँध स्वप्नों की गठरी
रात का हम अवसान करें
नन्हें पंख पसार के नभ में

फिर से एक नई उड़ान भरेंं

 ज़िन्दगी जीना चाहती हूं 
बूँद -बूँद कर हर रोज 
कम हो रही है न 

  मारीना मेरा पहला प्यार 
 जिन्दगी के प्रति प्रेम से भरी एक बच्ची
 किस तरह बड़े होते हुए चीज़ों को देखती है, महसूस करती है, 

 "आँख-मिचौली” 
  नहाया धोया …, गीला सा चाँद 
उतर आया है , क्षितिज छोर पर 
थोड़ी देर में खेलेगा हरसिंगार की 

शाख पर आँख-मिचौली

 नहीं मैं कोई कवयित्री!! 
 कवयित्रि!......नहीं ,

मै  कहाँ कवयित्री कोई।

नहीं रचती मैं कोई कविता


मैं,सिर्फ एक 'नारी' हूँ ,

 जीवन तो होम किया
 जीवन तो होम किया
पर जिद ने मेरी

पत्थर को मोम किया।

 वकील-ए-सफ़ाई बनने से इंकार
 तेरे गुनाह पे, पर्दा-ए-झूठ, डाल तो दूं, 

मुझे इन्साफ़ की देवी का खौफ़, रोके है. 

  उड़ान
 छूकर दिखा दे आज
हिमालय की बुलंदी,
बनकर भगीरथ

गंग का आह्वान कर !

 तेरी कहानी-1 
   रामरती (एक थी रामरती ) अपनी 
निर्भीकता कई पीढ़ियों में बाँट कर 
आखिर अपनी कोशिश में कामयाब हो ही 
जाती  और तैयार कर ही देती है न जाने कितनी मणिकर्णिका।

 अन्याय के खिलाफ़ 
 जब तक बैठा था दुम दबाकर,
दुःखी था मैं,
वार पर वार हो रहे थे,

पर खामोश था मैं,

 एक भीड़ से निकल कर खिसक कर दूसरी भीड़ में 
 भीड़ से भीड़ में 
खिसकता चलता है 
मतलब को जेब में 
रुमाल की तरह 

 नारी हूँ मैं 
तुम क्या जानो
आज की नारी हूँ मैं !

वाट्स अप जिंदगी

 आंधी वर्षा से नरमाई रैन की ,

शीतल सुहानी भोर में अपार्टमेंट की,


बालकॉनी में बैठ चाय की चुस्कियां लेते,

  मुझे तन्हाइयां बख्शो 
कहीं इस शोर से आगे 
अंधेरे घोर के आगे 

दंगा 
  शासन करना हो जनता पर,

सजा लो राजनीति का समर.

  "युद्धरत आम आदमी" के 
मार्च २०१८ अंक में प्रकाशित नीरज नीर की कवितायें 

 निर्भय हो विचरण करती 
अपनी क्षमता जानती
अनजान नहीं परम्पराओं से 
  सीमाएं ना लांघती |

 अपमान के साथ मिले लाभ 
से सम्मान के साथ हानि उठाना भला
 दूध की कमाई दूध और पानी की पानी में जाती है

चोरी की ऊन ज्यादा दिन गर्माइश नहीं देती है

 ख़्वाहिशात भी इक दिन बूढ़ा जाएंगे अपने 
आप, न खींच इतना उम्र को रबर की 
तरह, कुछ हाशिए के लोग भी 
रखते हैं अहमियत अपनी 

आदरणीय 'रवींद्र' जी की रचना उनके ही स्वर में 



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